कालसर्प योग


    ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राहु और केतु छाया ग्रह हैं जो सदैव एक दूसरे से सातवें भाव में होते हैं.जब


सभी ग्रह क्रमवार से इन दोनों ग्रहों के बीच आ जाते हैं तब यह योग बनता है. राहु केतु शनि के समान 


क्रूर ग्रह माने जाते हैं और शनि के समान विचार रखने वाले होते हैं । राहु जिनकी कुण्डली में अनुकूल 


फल देने वाला होता है उन्हें कालसर्प योग में महान उपलब्धियां हासिल होती है । जैसे शनि की साढ़े 


साती व्यक्ति से परिश्रम करवाता है एवं उसके अंदर की कमियों को दूर करने की प्रेरणा देता है इसी 


प्रकार कालसर्प व्यक्ति को जुझारू, संघर्षशील और साहसी बनाता है । इस योग से प्रभावित व्यक्ति 


अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करता है और निरन्तर आगे बढ़ता जाता है ।

 

           कालसर्प योग में स्वराशि एवं उच्च राशि में स्थित गुरू, उच्च राशि का राहु, गजकेशरी योग,


चतुर्थ केन्द्र विशेष लाभ प्रदान करने वाले होते है । अगर सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो कालसर्प 


योग वाले व्यक्ति असाधारण प्रतिभा एवं व्यक्तित्व के धनी होते हैं । हो सकता है कि आपकी कुण्डली में 


मौजूद कालसर्प योग आपको भी महान हस्तियों के समान ऊँचाईयों पर ले जाये अत: निराशा और 


असफलता का भय मन से निकालकर सतत कोशिश करते रहें आपको कामयाबी जरूरी मिलेगी । इस 


योग में वही लोग पीछे रह जाते हैं जो निराशा और अकर्मण्य होते हैं परिश्रमी और लगनशील व्यक्तियों 


के लिए कलसर्प योग राजयोग देने वाला होता है ।

 

कालसर्प योग में त्रिक भाव एवं द्वितीय और अष्टम में राहु की उपस्थिति होने पर व्यक्ति को विशेष


परेशानियों का सामना करना होता है परंतु ज्योतिषीय उपचार से इन्हें अनुकूल बनाया जा सकता है ।


संस्‍थान द्वारा कालसर्प योंग हेतु विषेश पुजन एवं यंत्र की व्‍यवस्‍था की है ।

 

 

 

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